कपड़े पर छपे डिजाइन से शुरू होती है महीनों की मेहनत
लखनऊ और आसपास के गांवों में चिकनकारी का काम करने वाली महिलाओं तक कपड़ा अक्सर पहले से छपे हुए डिजाइन के साथ पहुंचता है। इसके बाद महिलाएं सुई और धागे की मदद से उन डिजाइनों को कपड़े पर उकेरती हैं।
एक कपड़े को तैयार करने में कई दिन और कई बार हफ्ते तक लग सकते हैं। बारीक कढ़ाई के लिए धैर्य, अनुभव और हाथ की अच्छी पकड़ की जरूरत होती है।
लखनऊ से देश-विदेश तक पहुंचती है चिकनकारी
कारीगरों की मेहनत से तैयार होने वाले चिकनकारी के कपड़े लखनऊ के बाजारों से निकलकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं। इनकी मांग विदेशों में भी है।
बाजार में पहुंचने के बाद इन्हीं कपड़ों की कीमत काफी बढ़ जाती है। इसमें डिजाइन, कपड़े की गुणवत्ता, कढ़ाई की बारीकी, ब्रांड और बिक्री से जुड़े दूसरे खर्च भी शामिल होते हैं।
कारीगर की मेहनत और अंतिम कीमत के बीच बड़ा अंतर
चिकनकारी के कपड़े की अंतिम बिक्री कीमत और उसे तैयार करने वाली महिला की मजदूरी के बीच अक्सर बड़ा अंतर दिखाई देता है।
कारीगर महिलाओं को उनकी कढ़ाई के हिसाब से भुगतान किया जाता है, जबकि तैयार उत्पाद आगे कई स्तरों से गुजरकर बाजार तक पहुंचता है। ऐसे में जिस काम में उन्हें कई दिन या हफ्ते लगते हैं, उसकी अंतिम कीमत का बड़ा हिस्सा उनके हाथों तक नहीं पहुंचता।
चिकनकारी सिर्फ कपड़ा नहीं, एक हुनर है
लखनऊ की चिकनकारी को लंबे समय से शहर की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा जाता रहा है। इसके पीछे हजारों कारीगरों का पारंपरिक हुनर और मेहनत है।
खास तौर पर ग्रामीण और निम्न आय वाले परिवारों की कई महिलाएं घर से ही कढ़ाई का काम करती हैं। उनके लिए यह काम घरेलू जिम्मेदारियों के साथ आय का एक जरिया भी है।
चिकनकारी के बढ़ते बाजार और ऊंची बिक्री कीमतों के बीच कारीगरों की मजदूरी और उनके काम की वास्तविक कीमत का सवाल लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।
⚠️ जरूरी सूचना: कारीगरों की वास्तविक मजदूरी डिजाइन, कपड़े, कढ़ाई के प्रकार, काम की जटिलता और सप्लाई चेन के अलग-अलग स्तरों के आधार पर बदल सकती है। इसलिए हर चिकनकारी उत्पाद पर एक समान कमाई का आंकड़ा लागू नहीं किया जा सकता।